google.com, pub-7610353441165800, DIRECT, f08c47fec0942fa0 मुझे याद है ज़रा ज़रा: ज़िन्दगी दिलों को कभी जोड़ती भी है

ज़िन्दगी दिलों को कभी जोड़ती भी है

  ज़िंदगी दिलों को कभी तोड़ती भी है  


ज़िंदगी है न! बहुत अजीब शैय है।
बहुत से रंगों से  भरी हुई है। इंसान न भी देखना चाहे तो भी अपने रंग अवश्य दिखाती है। आने वाले अगले ही पल क्या सम्भव हो सकता है इसका कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता। बहुत से कड़वे मीठे अनुभव करवाए ज़िंदगी ने। बहुत सी जगहों का भर्मण भी करवाया ज़िंदगी ने। मिलने वालों में बहुत ही अच्छे लोग भी थे कुछ लोग बुरे भी थे लेकिन यादें तो सभी लोग छोड़ ही गए दिल में। बहुत सी बातें व्यक्तिगत रही होंगीं लेकिन बहुत सी ऐसी बातें भी हैं जिनका ज़िक्र आप से करना भी ज़रूरी है। उन में से कुछ बातों का ज़िक्र है इसी मंच पर। आपको कैसा लगा यह भी बताते रहें। 

आप ने भी ऐसा बहुत कुछ देखा होगा। आप भी अपनी यादों को कलमबद्ध करिए।आपकी रचनाओं का भी स्वागत रहेगा। सम्भव हो तो सबंधित तस्वीरें भी अवश्य भेजिए। उपलब्ध हो तो वीडीओ भी भेज सकते हैं। कोशिश करिए जिस ने भी फोटो क्लिक की या वीडीओ बनाई उसका उल्लेख भी आ सके। किसी खास स्थान को देखने गए हों तो वहां के अनुभव भी लिख सकते हैं। आपको रचनाओं की इंतज़ार रहेगी ही। 

आखिर में सन 1969 में आई फिल्म आदमी और इंसान के लोकप्रिय गीत की आखिरी पंक्तियां भी ज़रा ध्यान से देखिए:

ज़िन्दगी कभी यक़ी कभी गुमान है

हर क़दम पे तेरा

मेरा इम्तहान है

ज़िन्दगी के रंग कई रे

साथी रे ज़िन्दगी के राग कै रे

ज़िन्दगी के रंग कई रे

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