Tuesday, December 30, 2025

इस बार पुस्तक मेलों पर एक नज़र

 Medialink32 on Tuesday 30th December 2025 at 18:10 Regarding Book Festivals Jalandhar

पुस्तक मेला जालंधर में आ रहा है और दिल्ली में भी//आपका कहां जाने का मन है इस बार?


चंडीगढ़//जालंधर//लुधियाना:30 दिसंबर 2025: (रेक्टर कथूरिया//साहित्य स्क्रीन डेस्क):: 

पुस्तक प्रेम के बहुत से सच्चे किस्से आपने भी सुने देखे होंगें। मैनें भी इनका अनुभव बहुत बार किया है। लोगों से बहुत सी बातें सुनीं। बहुत से कटाक्ष झेले लेकिन पुस्तक प्रेम कभी कम  यहीं हुआ। 
कई बार जेब में पैसे नहीं होते थे तो भी स्टाल का चक्क्र लगा लेना। जेब से जितने पैसे निकल सकते निकाल लेने जो कम पढ़ते उनका उधार कर लेना।  उन पुस्तक विक्रेताओं में से कई मित्रों के नाम आज भी याद हैं। कई इस दुनिया से विदा भी हो गए। 

कईओं ने कारोबार बदल लिया। आखिर बदलती अर्थव्यवस्था में बहुत बार बहुत से कदम मजबूरी में उठाने पड़ते हैं। उन्होंने भी मजबूरी में ही कारोबार बदले। जब धीरे धीरे अख़बार रस्लों की बिक्री भी कम होने लगी तो शायद कोई दूसरा चारा ही नहीं था। जो बस स्टैंड, घंटाघर, किसी प्रमुख चौंक या रेलवे स्टेशन पर होते थे।उनमें से भी कइयों ने कैंटीन खोल ली और किसी ने कुछ और सामान डाल लिया। हिन्द पाकिस्त बुक्स तक ने भी सस्ते वाले पेपरबैक्स एडीशन बहुत पहले ही प्रकशित कटने बंद कर दिए थे। मैंने खुद उस पुस्तक आंदोलन के दौरान दो या तीन रुपए  प्रति पुस्तक के हिसाब से बहुत सी अच्छी पुस्तकें पढ़ीं थी। इस बार जालंधर में पुस्तक मेला 9 से 11 तक लग रहा है। निश्चय ही आपको इस पुस्तके मेले में जाक बहुत सी मनपसंद पुःतकें मिलेंगी ही। 

लुप्त होते हुए इस विशाल पुस्तक बाजार को एक तो सहारा दिया था हिन्द पैकेट बुक्स की घरेलू लायब्रेरी योजना ने। हर महीने आपकी चुनी हुई पसंद की किताबें डाकिया घर पर ले आता था। पेमेंट वीपीपी सु हुआ करती थी। जिस दिन किताबें आनी होती उनकी इंतज़ार कई दिन पहले ही शुरू हो जाती।  हर महीने की वो रकम कोई ज़्यादा नहीं होती थे लेकिन जब मंदी चल रही हो तो कम पैसे भी बहुत लगते हैं। इस लिए चवन्नी अठन्नी एक रुपया भी बचा कर रखने कि कहीं डाकिए को देते समय पैसे कम न पड़ जाएं। ज़िंदगी में बुरे लोग भी मिलते रहे लेकिन अच्छे लोग भी बहुत मिले। वह डाकिया भी अच्छा ही था. पैसे कम पड़ने या उस समय न होने तो उस डाकिये ने कहना मैं दे देता हूँ आप बाद में मुझे दे देना। इस तरह लायब्रेरी ने अंतर्मन के पुस्तक प्रेम को और बढ़ाया साथ ही पुस्तकों को सहेजना भी सिखाया। पुस्तकों की सौगात का कल्चर भी अच्छा लगने लगा। 

स्कूल और अन्य संस्थानों की लायब्रेरी भी मन पसंद जगह बन गई। शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहाँ मेरा आनाजाना रहा हो लेकिन मुझे उसकी लायब्रेरी न पता हो। कई गांवों में तो बहुत अभियान चला कर लायब्रेरी खुलवाई। 

पुस्तक लायब्रेरी के बाद पुस्तक संस्कृति और कारोबार को एक नया उत्साह दिया पुस्तक मेलों ने। एक तो पुस्तकों की विविधता और विभिन्निता दूसरा के ही जगह ओर है क्षेत्र की पुस्तकें।  ऊपर से सस्ती भी पड़ती क्यूंकि डिकाऊँट मिल जाता था। [प्रकाशक निशुल्क भी बहुत कुछ देते जैसे की पत्र पत्रिकाएं और अन्य छोटी मोटी पुस्तिकाएं भी वहां से मिला जाती। लेखकों से भेंट का सुअवसर अलग रहता। उनसे बातें करने का आनंद ही अलग रहता।  हालाँकि अब सेहत की समस्या होने लगी हैं फिर भी पुस्तकों का लोभ हमेशां बना रहता है। पुस्तक मेलों की इंतज़ार भी बनी रहती है।  अब सबसे नज़दीक गौ जालंधर में लगने वाला पुस्तक मेला। 

वैसे निकट भविष्य में आपके क्षेत्र में भी प्रमुख पुस्तक मेले आयोजित होने वाले हैं।  एक जालंधर में और दूसरा नई दिल्ली में। दिलचस्प बात है की दोनों में अलग तरह का आकर्षण रहेगा। 

यहां संक्षिप्त विवरण भी दिया जा रहा है। वास्तव में पंजाब का जालंधर दशकों से ही प्रकाशन केंद्र रहा है। एजुकेशन से सबंधित पुस्तकों का भी और समाचार पत्रों का भी। माई हीरां गेट बाजार वाले इलाके में ज़्यादातर लोग पुस्तकें खरीदने ही आते थे। जानेमाने लेखक दीपक जालंधरी का कार्यालय हम सभी के लिए बहुत प्रमुख संस्थान रहता। सारा दिन चायपानी जल पान चलता रहता। मंडी रॉ यूं तो फिल्म वितरकों का केंद्र था लेकिन यहां रचना प्रिंटर्स वाले हरीश वि भी बहुत आकर्षक शख्सियत थे।  

खौर बात तो चल रही थी पुस्तक मेले की। इस बार भी बुकमाफिया का ड्रीम बुक फेयर-जालंधर में आकर्षण का केंद्र रहेगा ही। तारीखें हैं 9 जनवरी से 11 जनवरी 2026 अर्थात नए बार्स के आरंभिक दिन। स्थान: किंग्स होटल, ग्रैंड ट्रंक रोड, न्यू मार्केट, जवाहर नगर, जालंधर। मुख्य आकर्षण: इस मेले में 5 लाख से अधिक किताबें होंगी और आप किताबों को वजन के हिसाब से खरीद सकते हैं ("Buy Books by Weight")। प्रवेश निःशुल्क है। 

कुल मिलाकर वज़न के हिसाब से पुस्त्कें खरीदने वालों को भी सस्ती पड़ जाती हैं। आप चाहो तो इस बार आज़मा कर देख लो। मैंने यह सिलसिला चंडीगढ़ में देखा तो मुझे बहुत ही अच्छा लगा। आप भी आइए इस बार मिलते हैं जालंधर में। 

Thursday, December 4, 2025

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन..... !

3rd December 2025 at 10:49 मुझे याद है ज़रा ज़रा नई ब्लॉग पोस्ट  

जालंधर से भी बहुत सी यादें जुडी हुई हैं 

खरड़//मोहाली:3 दिसंबर 2025: (रेक्टर कथूरिया//मुझे याद है ज़रा ज़रा डेस्क)::


सत्तर का दशक भी खत्म हो चुका था।
बांग्लादेश की जंग भी समाप्त हो चुकी थी लेकिन खबरों और सियासत में इस जंग की परछाईआं अक्सर महसूस हो ही जाती थी। बंग बंधू शेख़ मुजीबुर रहमान की छवि भी देश भर में छायी  हुई थी। नवयुवा और दुसरे कलाकार भी शेख़ मुजीबुर रहमान के पेंसिल स्कैच बनाते आम नज़र आ जाते थे। बंगलादेश की स्वतंत्रता के साथ देश की भावनाएं जुडी हुई थी। अख़बारों में अक्सर यही खरें सुर्खियां बनी होतीं। बंगलादेश की स्टोरियां बहुत उभार कर प्रकाशित की जा रही थीं। 

पंजाब के राजनैतिक हालात भी कुछ बदल चुके थे। सियासत से जुड़े वाम के मित्रों और शुभचिंतकों ने भी पिता जी को सलाह दी थी कि अब भूमिगत वाले जीवन के अज्ञातवास से बाहर आ कर खुले माहौल वाली लोकतान्त्रिक धारा में काम करें। सत्ता की तरफ से आ रहे ब्यान भी बहुत लुभावने थे। फिर भी सोचने वाली बात थी की इन लुभावने बयानों में कितना सच होता है। इन पर यकीन करना सही भी है या नहीं?

मानसिकता और हालात दोनों ही दुविधापूर्ण थे। यह फैसला आसान भी नहीं था कि पंजाब लौटना उचित होगा या नहीं?  इसका फैसला यथा सहज भी नहीं था। इसी सोच विचार में एक डेड बरस और गुज़र गया। सरकार की सख्त नीतियों के चलते 28 जुलाई 1970 को बाबा बूझा सिंह को ग्रिफ्तार करके एक झूठे पुलिस मुकाबिले में उनकी हत्या की जा चुकी थी। नक्सलवादियों के लिए माहौल लगातार गंभीर बना हुआ था। मार्च 1972 में पंजाब के मुख्य मंत्री बन कर अप्रैल 1977 तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले ज्ञानी ज़ैल सिंह बहुत तेज़ी से लोकप्रिय हुए। 

मैंने अपने जन्मस्थल वाले बचपन के उस  घर के इलाके नवां मोहल्ला की एक नुक्क्ड़ में सटे प्रसिद्ध मोचपुरा बाजार और उसके जानेमाने सुभानी बिल्डिंग चौंक वाले इलाके में मुख्यमंत्री ज्ञानी ज़ैल सिंह को एक खुली जीप में देखा। वे आम जनता के इतने नज़दीक थे कि बच्चे भी उन्हें छू पा रहे थे। उन्होंने की बच्चों की तरफ गुलाब के फूल भी उछाले ,उन्होंने खुद भी अपनी लंबी अचकन जैसी पौशाक पर गुलाब का बड़ा सा फूल टांगा हुआ था। उन्हें देख कर चाचा जवाहर लाल नेहरू की छवि याद आ रही थी। ज्ञानी जी से मिलने की बहुत इच्छा हुई लेकिन मेरी उम्र भी बहुत कम थी और मेरी वहां सुनता भी कौन। फिर भी यह इच्छा पूरी हुई कुछ बाद में अमृतसर जा कर। इस सारी  कहानी की चर्चा भी लिसी अलग पोस्ट में सही। 

पंजाब लौट कर साहित्य की लग्न और बढ़ गई। उन दिनों पंजाब का अखबारी केंद्र जालंधर ही था। चंडीगढ़ से अंग्रेज़ी ट्रिब्यून ही प्रमुख समाचार पत्र निकलता था। ट्रिब्यून के बाद इंडियन एक्स्प्रेस और जनसत्ता भी चंडीगढ़ से निकलने लगे। जालंधर से हिंदी मिलाप, मिलाप, वीर प्रताप और प्रताप, पंजाब केसरी, हिन्द समाचार, पंजाबी में कौमी दर्द, अकाली पत्रिका, अजीत, जत्थेदार अखबार प्रमुख हुआ करते थे। इन में सबसे महत्वपूर्ण गिना जाता था वाम समर्थक पंजाबी समाचार पत्र नवां ज़माना। यही वाम पत्र था जिसने बहुत से नए लोगों को पत्रकारिता के गुर सिखाए।

इसी मीडिया ससंथान में रहते हुए बहुत से महान लोगों से मुलाकात भी होती रही। इन महान लोगों से हुई मुलाकातों और बातों की चर्चा भी होती रहेगी। फिलहाल यहां विराम चाहता हूँ। 

इस बार पुस्तक मेलों पर एक नज़र

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