Thursday, August 23, 2018

हर दुखता दिल मेरा है-रेक्टर कथूरिया

अमिता सागर जी की पोस्ट ने याद दिलाया अतीत का दर्द
तुम सितारों पर 
अपना पैगाम 
लिख कर भेजो ना,
मैं जागती हूँ
रात भर
पढ़ लूंगी

ऊपर दी गयीं पंक्तियाँ तेज़ी से उभर कर सामने आई शायरा अमिता सागर जी की हैं। नकोदर उनकी कर्मभूमि है। एक ऐसा इलाका जहाँ अभी भी आजकल के अंधे विकास की मार से बचा हुआ सकून कुछ बाकी है। वहां दाखिल होते ही लगता है कि हम अभी भी प्रकृति के नज़दीक हैं। 
कुछ समय पहले-शायद अगस्त 2018 में उन्होंने इस छोटी सी काव्य रचना को फेसबुक पर पोस्ट किया था। पढ़ कर कुछ अलौकिक सा अनुभव हुआ। मैं इनको पढ़ कर खुद में मग्न था। हालांकि समाचार डेस्क पर इस तरह खुद में मग्न होना उचित नहीं होता। खबरों में संवेदनशील भी रहना होता है लेकिन खुद को पत्थर भी बना कर रखना होता है। भावुक आवेग में कहीं सच्चाई धुंधला न जाये इसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है। इतने में समाचार डेस्क पर ही किसी सहयोगी ने पूछा भला सितारों पर पैगाम भेजना कैसे सम्भव है? मैंने कहा अमिता सागर खुद भी शायरा है और साथ ही हरदयाल सागर जैसे बेहद क्षमतावान शायर की पत्नी भी है--इस लिए वह सितारों को भी संचार का माध्यम बना सकती है। 
Rector Kathuria  Amita Sagar जी वास्तव में मुझे आपके इन शब्दों में अतीत याद आया---याद ही नहीं आया---किसी फिल्म की भाँती आँखों से गुज़रा...फिर से नज़र आया--मैं बहुत छोटा था--लेकिन मुझे अपने माता पिता से अलग रहना पड़ा--पिता जी के विचारों ने उन्हें सत्ता के गलियारों की आँख का दुश्मन बना दिया--उन्हें अंडरग्राऊंड होना पड़ा--सख्तियाँ बढती गयीं---मुझे कहीं अलग रहना पड़ा--पिता जी कहाँ थे नहीं मालूम था--मां कहाँ थी नहीं पता था---जहाँ रहता था उन्होंने बहुत प्रेम से रखा' वहां कोई कमी भी नहीं थी लेकिन माता पिता की याद आती---ख़ास कर माँ की---चिठ्ठी भी कैसे लिखता--कोई पता नहीं था---हर रिश्तेदार के पते पर भी पहरा था और डाक भी सेंसर होती थी--तब--केवल आसमान पर निकले सितारे और चाँद ही था जिनको देख कर लगता--मेरी मां जहाँ भी होगी कम से कम सितारों को तो ज़रूर देखती होगी---मुझे मालूम है परेशानी के मारे मां को नींद नहीं आती थी---मुझे महसूस होता यही वोह केंद्र बिंदु है जहाँ हमारी नज़र शायद मिलती होगी---और मेरी मां मेरे आंसू और उदासी देख लेती होगी---अन्याय के खिलाफ बोलना--किसी स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए कुछ करना---यहाँ किसी जुर्म से कम तो नहीं----हम सभी ने इस जुर्म की सजा भुगती है---अब भी यह सिलसिला जारी है--परिवार के बहुत से सदस्य खो कर भी यह सज़ा जारी है---मुझे यहाँ की तथाकथित महानता पर कभी गर्व नहीं हुआ--सो आपकी काव्य पंक्तियाँ मुझे बहुत पीछे ले गयीं--जब मैं शायद केवल आठ दस वर्ष का था--- सत्ता की सख्तियाँ मुझे जहाँ श्री गुरु गोबिंद सिंह जी और भगत सिंह के विचारों के नजदीक ले गयीं वहीँ आम जनता के भी पास ले कर गयीं---मैं किसी दल का सदस्य नहीं--लेकिन हर दुखता दिल मेरा है---इसलिए आपकी पंक्तियों का एक बार फिर आभार...
इसके जवाब में अमिता सागर जी ने लिखा:Amita Sagar Rector Kathuria मुझे इस बात का दुख होता है कभी कभी कई पाठक इसे मेरी निज की व्यथा समझ लेते हैं। जबकि हर संवेदनशील व्यक्ति मे दूसरे का दर्द पहचान लेने का सामर्थ्य होता है। वैसे एक बात सांझी थी हममें मेरे मम्मी जी को उस दिन मुखाग्नि दी गई थी जिस रात मैंने यह लिखा। 
अमिता सागर जी की एक काव्य पोस्ट पर किया गया कुमेंट 



इस बार पुस्तक मेलों पर एक नज़र

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