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Thursday, December 4, 2025

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन..... !

3rd December 2025 at 10:49 मुझे याद है ज़रा ज़रा नई ब्लॉग पोस्ट  

जालंधर से भी बहुत सी यादें जुडी हुई हैं 

खरड़//मोहाली:3 दिसंबर 2025: (रेक्टर कथूरिया//मुझे याद है ज़रा ज़रा डेस्क)::


सत्तर का दशक भी खत्म हो चुका था।
बांग्लादेश की जंग भी समाप्त हो चुकी थी लेकिन खबरों और सियासत में इस जंग की परछाईआं अक्सर महसूस हो ही जाती थी। बंग बंधू शेख़ मुजीबुर रहमान की छवि भी देश भर में छायी  हुई थी। नवयुवा और दुसरे कलाकार भी शेख़ मुजीबुर रहमान के पेंसिल स्कैच बनाते आम नज़र आ जाते थे। बंगलादेश की स्वतंत्रता के साथ देश की भावनाएं जुडी हुई थी। अख़बारों में अक्सर यही खरें सुर्खियां बनी होतीं। बंगलादेश की स्टोरियां बहुत उभार कर प्रकाशित की जा रही थीं। 

पंजाब के राजनैतिक हालात भी कुछ बदल चुके थे। सियासत से जुड़े वाम के मित्रों और शुभचिंतकों ने भी पिता जी को सलाह दी थी कि अब भूमिगत वाले जीवन के अज्ञातवास से बाहर आ कर खुले माहौल वाली लोकतान्त्रिक धारा में काम करें। सत्ता की तरफ से आ रहे ब्यान भी बहुत लुभावने थे। फिर भी सोचने वाली बात थी की इन लुभावने बयानों में कितना सच होता है। इन पर यकीन करना सही भी है या नहीं?

मानसिकता और हालात दोनों ही दुविधापूर्ण थे। यह फैसला आसान भी नहीं था कि पंजाब लौटना उचित होगा या नहीं?  इसका फैसला यथा सहज भी नहीं था। इसी सोच विचार में एक डेड बरस और गुज़र गया। सरकार की सख्त नीतियों के चलते 28 जुलाई 1970 को बाबा बूझा सिंह को ग्रिफ्तार करके एक झूठे पुलिस मुकाबिले में उनकी हत्या की जा चुकी थी। नक्सलवादियों के लिए माहौल लगातार गंभीर बना हुआ था। मार्च 1972 में पंजाब के मुख्य मंत्री बन कर अप्रैल 1977 तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले ज्ञानी ज़ैल सिंह बहुत तेज़ी से लोकप्रिय हुए। 

मैंने अपने जन्मस्थल वाले बचपन के उस  घर के इलाके नवां मोहल्ला की एक नुक्क्ड़ में सटे प्रसिद्ध मोचपुरा बाजार और उसके जानेमाने सुभानी बिल्डिंग चौंक वाले इलाके में मुख्यमंत्री ज्ञानी ज़ैल सिंह को एक खुली जीप में देखा। वे आम जनता के इतने नज़दीक थे कि बच्चे भी उन्हें छू पा रहे थे। उन्होंने की बच्चों की तरफ गुलाब के फूल भी उछाले ,उन्होंने खुद भी अपनी लंबी अचकन जैसी पौशाक पर गुलाब का बड़ा सा फूल टांगा हुआ था। उन्हें देख कर चाचा जवाहर लाल नेहरू की छवि याद आ रही थी। ज्ञानी जी से मिलने की बहुत इच्छा हुई लेकिन मेरी उम्र भी बहुत कम थी और मेरी वहां सुनता भी कौन। फिर भी यह इच्छा पूरी हुई कुछ बाद में अमृतसर जा कर। इस सारी  कहानी की चर्चा भी लिसी अलग पोस्ट में सही। 

पंजाब लौट कर साहित्य की लग्न और बढ़ गई। उन दिनों पंजाब का अखबारी केंद्र जालंधर ही था। चंडीगढ़ से अंग्रेज़ी ट्रिब्यून ही प्रमुख समाचार पत्र निकलता था। ट्रिब्यून के बाद इंडियन एक्स्प्रेस और जनसत्ता भी चंडीगढ़ से निकलने लगे। जालंधर से हिंदी मिलाप, मिलाप, वीर प्रताप और प्रताप, पंजाब केसरी, हिन्द समाचार, पंजाबी में कौमी दर्द, अकाली पत्रिका, अजीत, जत्थेदार अखबार प्रमुख हुआ करते थे। इन में सबसे महत्वपूर्ण गिना जाता था वाम समर्थक पंजाबी समाचार पत्र नवां ज़माना। यही वाम पत्र था जिसने बहुत से नए लोगों को पत्रकारिता के गुर सिखाए।

इसी मीडिया ससंथान में रहते हुए बहुत से महान लोगों से मुलाकात भी होती रही। इन महान लोगों से हुई मुलाकातों और बातों की चर्चा भी होती रहेगी। फिलहाल यहां विराम चाहता हूँ। 

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