Saturday:01st November 2025 at 02:15 AM मुझे याद है ज़रा ज़रा...!
एक दिन डाक्टर भारत भी चल बसे और जल्द ही ओंकार पुरी भी
यहां सिविल लाईन्ज़ में आ कर हमारे घर के नज़दीक ही था डाक्टर भारत का दफ्तर। इस दफ्तर में मीडिया भी चलता था और डिटेक्टिव एजेंसी जैसा काम भी। पुरी साहिब उनके काम में बहुत निकट वाले दोस्त थे। शायद इनका पद भी प्रसधन या महासचिव जैसा रहता था। इस लिए तकरीबन हर रोज नहीं तो दूसरे तीसरे दिन मुलाकात हो ही जाती। उनका यह साथ उनकी आखिरी सांस तक बना भी रहा। व्यवसाय से वह अकाउंटेंट थे। एकाउंट्स की बारीकियों को समझने वाले थे। नई आर्थिक नीतियों और टेक्स इत्यादि की उलझनों की भी उन्हें पूरी समझ थी।
उनके ग्राहकों में बहुत बड़े लोग भी थे जिनके आर्थिक फायदे की बात का ध्यान रखना उन्हें आता था। उनके कुछ ग्राहक तरनतारन के पट्टी इलाके में थे। यह शायद उनका पुश्तैनी इलाका ही था। वह हफ्ते दो तीन या कभी कभी चार दिन पट्टी जाया करते। उनकी ज़िद भी थी कि जाते थे अपनी स्कूटरी पर। चलाते भी बहुत तेज़ रफ़्तार में। जब वह बस पर सफर की बात नहीं माने तो हमने उन्हें मनाया कि आप काम वाले तीन चार दिन पट्टी में ही रहा करो। हर रोज स्कूटरी का इतना लंबा सफर मत किया करो। पट्टी से लुधियाना तक। अच्छा भला इंसान बस या कार में भी इतने लंबे सफर में थक जाता है।
खैर उन्होंने हर रोज़ स्कूटर के सफर की ज़िद छोड़ ही दी। वास्तव में बस पर चढ़ने के लिए बनी ऊंची सीढ़ियां उनके घुटनों में दर्द छेड़ देती थी। इसके लिए वह डाक्टर भारत की सलाह से एक बड़ी सी बोतल वाली आयुर्वेदिक दवाई भी पिया करते थे। कैप्सूल भी इस दवा में शामिल रहते। दोनों दवाएं महंगी हुआ करती पर उनकी जेब इतना खर्चा आसानी से उठा लेती थीं।
जब भी मिलते तो शाम का अरेंजमेंट कर के रखते थे। बस सूरज ढलते ही वह स्कूटर की डिक्की से सामान निकाल लाते। दोमोरिया पुल वाली मार्किट में प्रीतम का ढाबा बहुत पुराना था। शायद अब भी होगा लेकिन पिछले कुछ बरसों से उधर आनाजाना भी नहीं हुआ। प्रीतम की ज़िंदगी में प्रीतम से भी बहुत प्यार रहा क्यूंकि उसके पड़ोस में ही एक अखबार भी निकला करता था। अजीब इत्तिफ़ाक़ की जब अखबार के मालिक ने उस दूकान को बेचा तो वहां शराब का बहुत बड़ा ठेका खुल गया। हम हंसा करते देख ले प्रीतम तेरे और तेरे ढाबे के असली साथी बहुत नज़दीक आ गए।
इस पर नाराज़ हो कर बोलता। .मैं हूँ न अभी। बस चलो। ढाबे से लड़को को आवाज़ देता कि चल इनके स्कूटरों को साइड पर लगा और हमें खुद बाज़ू से पकड़ता और बहुत प्रेम से ढाबे में ले जाता। ढाबे में ले जाकर पांच सौ के दो नोट डाक्टर भारत साहिब के सामने रखता और कहता जिस ब्रांड की भी मंगवानी है मंगवा लो। जो खाना है उसका आर्डर दे दो मैं अभी भिजवाता हूँ। खुद बाहर काउंटर पर जा कर बैठ जाता। इसके बाद एक दो बार चक्र भी लगा जाता लेकिन उसने खुद कभी हमारे साथ दारू नहीं पिया। हमने कई बार गिला भी किया तो कहने लगा आप लोग वोडका पीते हो और मेरा ब्रांड और है। किसी दिन बैठेंगे ज़रूर। लेकिन वह दिन कभी न आया। बस हम बैठते और शाम ज़्यादा ढलने लगता निकलपड़ते। पुरी साहिब ने लुधियाना में भी शिमलापुरी जाना होता था। बस कुछ देर हवा प्याज़ी हो कर हम वापिसी की तयारी करते। बस उन दिनों यही थी हमारी दुनिया। अब जिसकी यादें शेष हैं।
हम लोगों के जिन गिने चुने कुछ मित्रों की एक छोटी सी दुनिया थी उस में में पुरी साहिब काफी सरगर्म रहे। उनकी याद आई तो सोचा किस के साथ बात करें। आखिर एक धड़ल्लेदार संगठन बेलन ब्रिगेड की संस्थापिका अनीता शर्मा जी और उनके पति श्रीपाल जी का ध्यान आया। उनसे बात की तो उन्होंने ने भी बहुत नम आंखों से उन्हें याद किया। डाक्टर भारत और अनीता शर्मा जी की टीम के साथ डाक्टर भारत और पुरी साहिब भी काफी सक्रिय रहते रहे। हर बरस 26 जनवरी और 15 अगस्त को जब डाक्टर भारत कार्क्रम का आयोजन करते तो सरगर्मी शुरू होते ही अनीता शर्मा सुबह सुबह लडडू के पचार डिब्बे ले कर पहुँच जाते। कुछ और लोग भी थे जो अपना अपना योगदान बहुत श्रद्धा से डालते। कई नाम हैं जिनकी चर्चा फर्क कभी करेंगे।
आखिर वही हुआ जिसका खतरा था। काश डाक्टर भारत सब अपनी आंखों से देख पाते। उनके जाने के बाद उस नाज़ुक घड़ी में चाईना गेट टीम के सभी दो चार सदस्यों का जो नैतिक कर्तव्य भी था इसे बचाने का वह भी मंद पड़ता गया। अंग्रेजी में शायद इसे Moral Duty भी कहा जाता है। अर्थात नैतिक कर्तव्य। मैंने सभी से कहा भी कि किसी तरह इन स्मृतियों को संभाल लिया जाए वरना वक़्त के साथ साथ हमारी ज़मीर और भगवान भी हम लोगों को कभी माफ नहीं करेंगे। कई मित्रों से कहा लेकिन सब व्यर्थ गया। डाक्टर भारत के बाद न इस संगठन को बचाया जा सका और न ही इस विचार को।
डाक्टर भारत के बाद ओंकार पुरी भी चल बसे। कोरोना डाक्टर भारत के रहते ही गंभीर हो गया था। फिर स्थिति और बिगड़ती चली गई। उदास मन से हमने भी लुधियाना छोड़ दिया। अब भी जब कभी लुधियाना जाना होता है तो उस इलाके में जाने का मन ही नहीं होता। उदासी लगातार गहराई हुई है। बस एक बार फिर से मानना पड़ता है कि जाने वाले कभी नहीं आते - --जाने वालों की याद आती है।
इन यादों में से जब जब भी किसी याद ने ज़ोर पकड़ा और कुछ लिखा भी गया तो ज़रुर दोबारा हाज़र हो जाऊंगा कोई न कोई नई रचना ले कर। तब तक के लिये आज्ञा चाहता हूं।




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