Drafted//Edited //Submitted on Thursday 5th February 2026 at 09:45 PM By Rector Kathuria
"युवक" सामाजिक तब्दीली का ज़ोरदार आंदोलन भी रहा
लुधियाना: 6 फरवरी 2026: (रेक्टर कथूरिया//मुझे याद है ज़रा ज़रा--डेस्क)::
मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था!
बहुत से लोग छूट गए जो दिल के बेहद करीब भी थे। बहुत से लोग चल बसे कभी उम्र बहाना बनी , कभी कोई सड़क हादसा और कभी कोई बिमारी। बहुत से लोग किसी न किसी गलतफहमी या नाराज़गी की वजह से दूर हो गए। कुछ बहुत ही प्रिय मित्र और संसथान समय की धुल में आंखों से ओझल हो गए। इन्हीं में से एक मीडिया संस्थान भी था। वास्तव में यह एक लोकप्रिय पत्र था जिसका नाम था 'युवक"। यह साप्ताहिक भी था और मासिक भी। इसका साप्ताहिक अंक टेबलायड अकार का होता था। छोटे आकार के पृष्ठों वाला अख़बार लेकिन इसकी लोकप्रियता भी बहुत थी जबकि मासिक अंक एक पूर्ण पत्रिका की तरह था।
जब देश में आपातकाल का दौर था। समाज में बहुत ज़्यादा बेचैनी थी। युवा वर्ग में आक्रोश भी था। पंजाब में उस समय पंजाबी पत्रकारिता में बहुत कुछ हो भी रहा था। नक्सलवाद के हक़ में भी बहुत सी पत्रिकाएं निकलने लगी थी। उस समय आगरा से निकलने वाले मासिक पत्र युवक से भी संपर्क हुआ। पंजाब में युवा आंदोलन भी चल रहे थे और बेरोज़गारी के खिलाफ भी बेचैनी काफी थी।
पंजाब वालों को कई बार लगता था कि असहाय और पीड़ित वर्गों की आवाज़ शायद पंजाब के लोग ही उठाते हैं और वह भी पंजाबी में ही लेकिन आगरा से प्रकाशित पत्रिका युवक इस संबंध में सभी गलतफहमियों को दूर कर रही थी। मासिक पत्रिका "युवक" ने देश और दुनिया के हर पीड़ित वर्ग की आवाज़ उठाई। इस तरह की विशेष कवरेज के चलते ही युवक परिवार से संपर्क जुड़ा जो समय के साथ साथ गहरा होता चला गया। लुधियाना और आगरा में उस समय बहुत बड़ी दूरी लगती थी लेकिन दिल, दिमाग और विचार मिले हुए थे। सत्तर के दशक में युवक परिवार से संपर्क बना जो काफी देर तक चला लेकिन अस्सी वाले दशक के मध्य में जब पंजाब के हालात खराब हुए तो फिर संपर्क में रुकावट आई। उस समय बहुत संबंधों में अंतराल आ गया। फिर हमलोगों को एकदूसरे की खबर भी न रही लेकिन हम लोगों का आपसी वैचारिक प्रेम दिल में बसा हुआ था। युवक पत्रिका के मासिक अंक और साप्ताहिक पत्र-दोनों में ही प्रेमदत्त पालीवाल जी ने बहुत सम्मान से प्रकाशित किया।
इसके कुछ बाद तकनीक ने भी नई करवट ली। आम डाक की जगह कुरियर और ईमेल आ गई। लेकिन युवक के साथ संबंध तब का जब हम लोग अपनी रचना लिख कर लिफाफे में बंद करते। उस पर टिकट लगाते और नज़दीक के लेटर बॉक्स में दाल आते। पंजाब से आगरा भेजी रचना डाक द्वारा पहुँचने में दो-तीन दिन लग भी जाते।रचना प्रकाशित होने में भी समय लगता। जब प्रकाशित रचना वाला अंक आता तो हम सभी ,लोगों को बहुत ख़ुशी होती।
हालात के चलते युवक पत्रिका के दर्शन में देरी बढ़ने लगी। उस दौर में पंजाब के मीडिया ने भी बहुत कठिनाईओं का दौर देखा। बहुत बार मन में आता आगरा जा कर युवक परिवार से मिला जाए। दक्षिण भारत के यात्राओं पर आते जाते जब आगरा रास्ते में आता तो मन होता सफर बीच में ही छोड़ कर यहीं कुछ देर रुका जाए लेकिन साथ में कुछ लोग भी हुआ करते और हम लोग किसी न किसी विशेष आयोजन पर जा रहे होते। रेल की टिकट भी आरक्षित रहती। इस लिए आगरा से गुज़रते हुए भी युवक परिवार से भेंट करना हर बार छूट जाता। हाँ कल्पना में ज़रूर होती रही।
एक दिन इंटरनेट पर सर्च करते करते "युवक" पत्रिका भी मिली। इस परिवार के सदस्यों से फोन वार्ता भी होने लगी। और भूले बिसरे संबंध फिर से ताज़ा हो गए। आगरा से सबंधित और कलमकार भी मिलने लगे और सोशल मीडिया के साथी भी। अब बनाते हैं इस युवक पत्रिका परिवार से मिलने का विशेष कार्यक्रम।
"युवक" पत्रिका केवल एक मीडिया हाऊस बन कर ही नहीं बल्कि एक आंदोलन के तरह चलता रहा। इस पत्रिका के सूत्र बताते हैं कि वह एक ऐतिहासिक समय था। गौरतलब है कि जिन दिनों भारतीय स्वतंत्रता संग्राम नई ऊंचाईयां छू रहा था उन दिनों महात्मा गांधी जी के नेतृत्व मे इस आंदोलन ने नए रिकॉर्ड स्थापित किए। आम जनता के दिल दिमाग में देश प्रेम की ज्वाला प्रज्वलित करना आसान भी नहीं था। उस समय उत्तर प्रदेश को United Provinces - 1937 से 1950 तक कहा जाता था। कुछ सूत्रों के कहना है कि United Provinces ऑफ अवध ऐंड आगरा। राजधानी लखनऊ ही थी।
वास्तव में यूनाइटेड प्रोविंस ऑफ अवध ऐंड आगरा (संयुक्त प्रांत), ब्रिटिश भारत के समय आगरा प्रेसिडेंसी और अवध को मिलाकर 1902 में बनाया गया एक प्रमुख प्रांत था, जिसे 1935 में छोटा करके 'यूनाइटेड प्रोविंस' कहा गया। 24 जनवरी 1950 को इसका नाम बदलकर उत्तर प्रदेश (UP) कर दिया गया, जो आधुनिक भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य बना।
इसका गठन और विस्तार इतिहास का विशेष भाग रहे। बरस 877 में इसे अवध और उत्तर-पश्चिमी प्रांतों को मिलाकर बनाया गया, जिसे 1902 में आधिकारिक तौर पर यूनाइटेड प्रोविंस ऑफ आगरा एंड अवध नाम दिया गया। इस भूमि पर बहुत से ऐतिहासिक कार्य होते रहे।
इसकी राजधानी शुरुआत में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) थी, लेकिन 1921 में इसे लखनऊ स्थानांतरित कर दिया गया। यह भी एक विशेष ऐतिहासिक घटना रही। धर्म कर्म और अन्य सांस्कृतिक कारणों से भी इलाहाबाद (अब प्रयागराज) का विशेष महत्व हमेशां बना रहा।
इसके बाद इसके प्रदेश के नाम में बदलाव भी आया। फिर सन 1935 में इसका नाम संक्षिप्त रूप से 'यूनाइटेड प्रोविंस' (संयुक्त प्रांत) कर दिया गया और अंततः 24 जनवरी 1950 को यह उत्तर प्रदेश बन गया। इसे ही आजकल हम यूपी के नाम से जानते हैं।
यहां का प्रशासन भी बहुत अच्छा चलने लगा। इस क्षेत्र में तत्कालीन ऊपरी गंगा घाटी के क्षेत्र शामिल थे और इसका प्रशासन एक लेफ्टिनेंट-गवर्नर के अधीन था। यह प्रांत ब्रिटिश शासन के दौरान एक प्रशासनिक इकाई के रूप में कार्य करता था।
यहां अर्थात उत्तर प्रदेश में स्वतंत्रता का संग्राम भी चला और साहित्य का आंदोलन भी। कलम के क्षेत्र में भी प्रमुख नेताओं में श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल जी एक प्रमुख नेता माने जाते थे। आगरा स्थित उनका निवास इस आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन गया था। इसी परिवार में उनके यशस्वी भतीजे श्री प्रेमदत्त पालीवाल भी एक वरिष्ठ राजनेता, पत्रकार और प्रखर राष्ट्रवादी और क्रांतिकारी के रूप में भी प्रसिद्ध हुए। श्रीकृष्ण दत्त पालीवाल जी के संपादकत्व में जहाँ “सैनिक ” जैसा प्रखर राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित हुआ, जिसमें स. ही. वात्सयायन “अग्येय” जैसे दिग्गज लोग संपादक रहे और तत्कालीन हिंदी जगत के सभी बड़े लेखकों के लेख, कविताएं एवं स्वाधीनता संग्राम से संबंधित रचनाएं प्रकाशित हुईं थीं,।आचार्य श्रीराम शर्मा और अक्षय कुमार जैन जैसे दिग्गज लोगों ने सैनिक का संपादन किया है। भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी ने इसमें लेख लिखे है जिनकी चर्चा भी होती रही। यह मीडिया हाऊस निरंतर विकास भी करता रहा। देश के साथ और देश की जनता के साथ "युवक" मीडिया हाऊस ने भी कदम बढ़ाए। देश के युवाओं को भी एकजुट करने में सक्रीय काम किया।
सन 1951 एक ऐतिहासिक बरस रहा जब श्री प्रेमदत्त पालीवाल जी ने “युवक ” नाम से एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया। यह इस मीडिया संस्थान में एक विशेष उपलब्धि थी। युवक पत्रिका के प्रकाशन के पीछे स्पष्ट ध्येय युवा वर्ग को राष्ट्रीय भावना से जोड़ना और उन्हें सही मार्गदर्शन देना भी था। युवक परिवार इस मकसद में काफी हद तक सफल भी रहा। बिना किसी शोरशराबे के युवक परिवार ने लगातार ठोस कार्य किया। बहुत से युवक अपनी कला और कलम के साथ "युवक" से जुड़े।
साहित्यिक क्षेत्र के साथ साथ राजनीति के मैदान में भी यह परिवार अग्रसर रहा। विशेष उल्लेखनीय बात यह थी कि श्री प्रेमदत्त पालीवाल जी युवक कांग्रेस के संस्थापक सदस्य भी थे और उन दिनों कांग्रेस की विचार धारा से युवाओं को जोड़ना एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी का काम समझा जाता था। कांग्रेस की नीतियां उन दिनों बहुत तेज़ी से समाज और युवा वर्ग को लुभा रही थी। वाम और कांग्रेस भी एक दुसरे के बहुत नज़दीक थे।
वैसे, पालीवाल परिवार गांधीवाद से प्रभावित होने के बावजूद, गरमदल के लोगों को अधिक महत्व देते थे। ” युवक”पत्रिका ने भी अपने समय में अपार ख्याति प्राप्त की और इस में भी अपने समय के सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों, कवियों, लेखकों की रचनाएं निरंतर छपती रहीं। यह भी कहा जाता है कि अनेक लेखकों ने तो अपना कैरियर ही युवक पत्रिका से शुरू किया। दिलचस्प बात कि युवक में लिखने वाले लोग केवल शायर या लेखक ही नहीं थे बल्कि राजनीति में भी खुल कर अपनी नीतियों और आदर्शों के लिए सक्रिय थे। जब वे युवक में रचना लिखते तो कई बार उनके संपर्क का पता भी साथ छपा होता। एक बार में लखनऊ गया तो वह थोड़ी देर के लिए रुकना था। एक जानेमाने लेखक थे जो बहुत तीखा लिखते थे। मैनें दिए गए पते पर मिलना चाहा तो तीन अलग अलग लोगों ने मुझे एक सब्ज़ी विक्रेता के पास भेजा। उसने बताया कि जिनको आप ढून्ढ रहे हैं वह तो आजकल अज्ञातवास में हैं। पुलिस उनकी तलाश कर रही है।
कुछ घंटों के बाद सब्ज़ी वाले उसी गुप्त "डाकखाने" पर दोबारा संपर्क हुआ तो सबंधित मित्र से भेंट भी हुई। मुझसे बड़ी उम्र के और जोशीले लेखक भी थे और नेता भी। आपातकाल चल रहा था। इस लिए वह भी अज्ञातवास में थे। उनसे मिल कर मुझे अहसास हुआ कि "युवक" के लेखक केवल कलमकार नहीं बल्कि ज़मीनी आंदोलनों से जुड़े सक्रिय नेता भी हैं। अज्ञातवास की कठिनाईयां या पुलिस के छापे उन्हें डरा नहीं पाते।
यह तो खैर अतीत था युवक की चर्चा करते करते और अब वर्तमान में भी इस आंदोलन को "युवक" परिवार ने और भी ज़ोरदार बनाया है। इस मीडिया हाऊस की धार और भी तेज़ हुई है। भविष्य की योजनाएं भी बहुत अच्छी हैं। जल्द ही आपको "युवक" नए रंग और नए तेवर भी नज़र आएंगे।
-------------रेक्टर कथूरिया

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