आज फिर याद आ रही है उनसे पहली मुलाकात
लुधियाना: 9 जून 2024: (रेक्टर कथूरिया//मुझे याद है ज़रा ज़रा)::
शायद 2018 के अगस्त सितंबर का ही कोई महीना था। लुधियाना के एक देहात नुमा शहरी इलाके में एक आयोजन रखा गया था। थोड़ी ही देर में वहां एक वैन और एक बस आ कर रुकी जहां महिलाओं की एक टोली एक जत्थे की तरह वहां पहुंची थी। उन्हीं में एक कुमुद सिंह भी शामिल थी। वह उनसे मेरी पहली मुलाकात थी। इस मुलाकात में ही लगा कि एक सच्चे इंसान में जो खूबियां होनी चाहिएं वे सभी उनमें मौजूद हैं। उनके चहेरे पर एक चमक थी जो संवेदना के अहसास की थी। शायरी, गीत-संगीत और बराबरी की बहुत सी बातें हुईं।
उनके लौट जाने के बाद भी उनसे कलम का एक रिश्ता बना रहा। हमें पूरा इंदौर ही नहीं बल्कि पूरा मध्य प्रदेश अपना अपना लगने लगा। फिर एक दिन अचानक देखा वह लखनऊ में हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट का फायदा भी है न कि दूर दराज बैठे किसी भी स्थान को झट से देख सकते हैं। तो उस दिन देखा लखनऊ में कुमुद सिंह तांगा चला रही हैं। मेरी तमन्ना बहुत थी लेकिन यह संभव न हो सका और अब तो लुधियाना में तांगा नज़र ही नहीं आता। तांगा का युग लोकल बसों के आने से ही खत्म होने लगा था फिर थ्री वीलर ऑटो रिक्शा वालों ने भी कसर पूरी कर दी। दिन रात मेहनत मशक्कत करने वालों का एक पूरा वर्ग लगभग समाप्त हो गया। कहां गए वे सभी लोग कुछ पता नहीं। कहाँ गए उनके घोड़े उनका भी कुछ पता नहीं। घोड़े तो किसी न किसी निहंग जत्थे में नज़र आ जाते हैं लेकिन तांगा तो लुप्त ही हो गया। जहां जहां के कस्बों, गांवों और शहरों में तांगा चल भी रहा है वहां भी तांगा चलाने वाले परिवार बड़ी मुश्किलों में। आते जाते आप किसी भी स्टेशन या इलाके में किसी तांगा चालक को देखें तो उससे उसका हाल चाल पूछने का प्रयास करना। आपको उसकी आँखों में आंसुओं भरा दर्द महसूस हो ही जाएगा।
कुमुद जी ने अपनी यात्राओं के दौरान रिक्शा चालक के दर्द को भी महसूस किया और तांगा चालक के दर्द को भी। ज़रा पढ़िए उनकी ही एक पोस्ट जो उन्होंने शुक्रवार 7 जून 2024 को दोपहर से कुछ पहले 11:28 पोस्ट की थी।
स्टेशन पहुंच कर जहां से बस पकड़नी थी वह जगह बमुश्किल एक किमी या उससे कम ही थी । रिक्शे वाले ने कहा, चलिए बहनजी । इतने रुपए दे देना। एक बारगी लगा पब्लिक ट्रांसपोर्ट में बैठ जाऊँ या पैदल ही चलूँ। फिर इतनी धूप में ये कहाँ मुझे खींच कर ले जाएगा। तभी वो बोला, बहनजी सुबह से कोई सवारी नहीं मिली है । बैठ जाइए, बोहनी हो जाएगी । कई बार समझ में नहीं आता कि जिस रिक्शे को इंसान खींच रहा है उस पर बैठना गलत है या ना बैठने पर उसके घर चूल्हा नहीं जलेगा, वो गलत है। फिर नज़दीक जाने के लिए रिक्शा पकड़ लेती हूँ और कोई मोल-भाव नहीं करती । रिक्शे का ऊपर का कपड़ा फटा है, चिलचिलाती धूप है लेकिन तेज धूप लगने की शिकायत नहीं करती। उससे क्या शिकायत करूँ। ज़्यादा चढ़ाई होने पर उतर कर थोड़ा पैदल भी चल लेती हूँ। सबके घर चूल्हा जले , यह ख्वाहिश रहती है।
खैर, एक बार लखनऊ गए तो तांगा पर बैठे। फिर चालक ने बताया कि ये जो लगाम है इसमें से बांई तरफ की रस्सी खींचने पर घोड़ा बांई ओर और दाहिना खींचने पर दांई ओर मुड़ता है। ये रस्सी बहुत हल्के से खींचना होती है। अच्छे चालक का घोड़े से एक तरह का रिश्ता बन जाता है फिर दोनों एक दूसरे के इशारे पर चलते हैं। वो कब थका, कब भूखा है मैं समझता हूँ और कितना, किधर मुड़ना है यह घोड़ा समझता है। फिर उसे मारने की ज़रूरत नहीं होती।
अब पहले जैसी कमाई नहीं होती लेकिन दो रोटी के लिए लगे रहते हैं दिन भर। अब वे नहीं चाहते कि उनकी अगली पीढ़ी का कोई बच्चा यह काम करे फिर भी सिखाते रहते हैं।
लेकिन हम इन मेहनतकश, मज़दूर और मजबूर लोगों के लिए कुछ मानवीयता और संवेदना कभी दिखाएंगे क्या? हम कब पूछेंगे सिस्टम और संसार से कि विकास का नया चेहरा हर बार इन गरीब लोगों का सब कुछ क्यों छीन लेता है? हमें इनकी फ़िक्र कब होगी?

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