Saturday, January 10, 2026

शनि की साढ़ेसाती कई रंगों में काफी कुछ दिखा सकती है

Blog Media Link on 10th January 2026 at 02:30 Regarding Astrology about Saturn 7.5 years

लेकिन हर चुनौती के सामने डटे रहना-पीछे मत हटना 


खरड़
(मोहाली) चंडीगढ़:10 जनवरी 2025: (मीडिया लिंक//आर के तारेश//यादें//मुझे याद है ज़रा ज़रा)):: 

ज़िंदगी की हर सुबह कई बार उमीदों से भरी होती है और कई बार निराशा के अंधेरों से। जिस दिन उम्मीद रौशन होती है उस दिन तन मन में एक उत्साहपूर्ण उड़ान उठने लगती है। जिस दिन निराशा का अंधेरा हो उस दिन बिस्तर से उठने का भी मन नहीं होता। बस यही लगता है कि उठ कर भी क्या करेंगे? कहां जाऐंगे? निराशा वाले दिन उठना भी पड़े तो बस मजबूरी में ही उठना होता है। इसके कारणों पर सोचा तो बहुत सी बातें मन में आईं। इस चिंतन में चलते चलते ज्योतिष के नज़रिये से ग्रह चाल देखने का भी मन किया। बात उठी दिमाग में भी और मन में भी। मन की बात तो ठीक लगती पर इस चाल को देखने और समझने की अक्ल कहां से लाते? ज्योतिष के  ज्ञान विज्ञान को समझना समझाना इतना सहज भी नहीं होता। 

ग्रह चाल पर दृष्टि डालने के लिए कुछ जानकार मित्रों से भी चर्चा की और गूगल बाबा से  भी गुजारिश की। बहुत पहले एक विद्वान मित्र हुआ करते थे डाक्टर ज्ञान सिंह मान। उनके पास बैठ कर बहुत सा नया ज्ञान मिलता था और मार्गदर्शन भी। फिर एक पत्रकार मित्र अजय कोहली भी इस क्षेत्र में काफी अनुभवी मिले। उन्हें तंत्र का भी अच्छा गया था। उन्होंने बहुत सी कठिन मुसीबतों का सामना इसी ज्ञान और शक्ति के आधार पर किया। इस तरह कई शुभचिंतक ज्ञानी जनों से चर्चा होती रही। 

मेरी राशि मीन है लेकिन मुझे इसका कोई विशेष ज्ञान नहीं। इस चर्चा के दौरान जो जानकारी मिली वह काफी गहरी भी महसूस हुआ।  इस जानकारी के मुताबिक 29 मार्च 2025 को शनि देव ने मीन राशि में प्रवेश किया और अब वह 3 जून 2027 तक इसी राशि (गुरु की राशि) में रहकर मीन राशि के जातकों को प्रभावित करेंगे। इस कहसेतर का ज्ञान कहता है कि यह समय मीन राशि वालों के लिए शनि की साढ़ेसाती का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण है, जो मानसिक अशांति, मेहनत में वृद्धि, आत्म-मंथन और करियर में चुनौतियों के साथ-साथ स्थिरता भी लाएगा। वैसे इसका अहसास होने भी लगा है। जो जो लोग स्वार्थ पूर्ण होने का रवैया दिखा थे और जेवल औपचारिकता निभाने तक रहने लगे थे। उनसे दूरी की भावना अब स्थिर दूरी जैसी बनने लगी है। उनसे कब मुलाकात हुई और कब नहीं इसका भी पता नहीं लगता। 

मीन राशि पर शनि गोचर (2025-2027) का प्रभाव इतना गहरा होगा कभी सोचा नहीं था। नास्तिकता की वजह से इस तरफ कभी ध्यान दिया भी नहीं था। लेकिन अब लगता है कि देना चाहिए था। बहुत सी चीज़ें जब समझ में नहीं आती तो वे निरथर्क लगने लगती हैं। जब ु का महत्व पता चलता है तब तक समय और अवसर निकल चूका  होता है। तब उस ज्ञान या उपलब्धि का भी कोई अर्थ नहीं रहता। 

इसी चर्चा के दौरान करियर और मेहनत के मामले में भी बताया गया कि शनि के लग्न (प्रथम भाव) में होने से काम में मेहनत ज्यादा करनी पड़ेगी। ऐसा हुआ भी। मेहनत तो करनी पड़ी लेकिन ऐसा भी मेहजसूस होने लगा कहैं यह मेहनत भी निरथर्क तो नहीं? इसी तथ्य जैसी बात के साथ यह भी बताया गया कि 2026 में मेहनत का फल भी मिलेगा। बस यही बात हैरानी वाली लगी क्यूंकि अतीत में बहुत बार ऐसा होता रहा की फल तो कोई और ही ले जाता था और मेहनत हम करते रह जाते। बहुत बार वह गीत याद आता---

सब कुछ सीखा हमने--न सीखी होशियारी---!

इसी तरह इसी विषय पर हुई चर्चा में कुछ कठिनाईयां आने के भी संकेत बताए गए। स्पष्ट कहा गया कि नौकरी और व्यवसाय में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। मुश्किलें और भी बढ़ सकती हैं लेकिन इनके परिणाम अच्छे ही रहेंगे। कठिनाई की  भविष्यवाणी सुनने की तो अब आदत सी ही होने लगी थी लेकिंन अच्छे परिणाम की बात सुनने में ही अजीब लगी। हमारे मामले में अच्छा कब से होने लगा? सुन कर हंसी जैसा अहसास भी हुआ। बताने वाले को भी इसका आभास हो गया। लेकिन वह भी खामोश रहे। 

जब ऐसी आशंका जताई तो साढ़ेसाती का विस्तार भी बताया गया। साफ़ कहा गया कि साढ़ेसाती का प्रभाव अभी रहेगा ही। इसके समापन की तारीख अभी दूर है अर्थात 8 अगस्त 2029 तक शनि की साढ़ेसाती रहेगी।इसलिए सावधान रहने की भी सलाह दी गई। बताया गया कि यह समय मानसिक तनाव और भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है। मुझे यह सब सुन क्र भी हंसी आ गई। मित्रलोगों से बात करते करते ऐसे अनुभव हो भी जाते हैं। बताने वाले ने पूछा हँसे क्यूं? मैंने कहा बात ही हंसने वाली है क्यूंकि तनाव और भ्रम की स्थिति मेरे जीवन में कोई नई नहीं है। अक्सर ही ऐसा होता रहा। कभी हम पूर्णिमा के चांद को रोतो समझ लेते थे और कभी सुंदर लड़की का चेहरा जिसके हम किसी ज़माने में दीवाने रहे। दीवाने तो खैर अब भी हैं लेकिन अब  फ़ाज़ली साहिब की शायरी में से ये पंक्तियाँ भी बहुत अच्छी लगने लगी हैं और इनकी हकीकत भी समझ आने लगी हैं कि 

दूर के चांद को ढूंढो न किसी आँचल में!

यह उजाला नहीं आंगन में समाने वाला!

अब तो लगने लगा है कि अगर ज्योतिष अंतरिक्ष के ग्रहों की चाल है तो शायरी की उड़ान भी कोई कम नहीं होती। इसके ज़रिए भी अंतरिक्ष देखे जा सकते हैं। शायरी इन ग्रहों के मन में क्या चल रहा है या चलेगा इस रहस्य को भी पकड़ लाती हैं। शायरी की उड़ान भी इस से कम नहीं होती। अब यह बात अलग है की शायरी अभी तक अच्छा खासा पैसा कमाने वाला कारोबार नहीं बन स्की जबकि ज्योतिष इस मामले में काफी विकसित हो चूका है। कुछ मामलों में बात कुछ अलग भी हो सकती है लेकिन मानसिक उड़ान मह्त्वपूर्णत तो होती है।  

एक बार एक ज्योतिष विशेषज्ञ महानुभाव से पूछा कि जेब की हालत कैसी रहेगी? हम सपने ही देखते रहेंगे या फिर सपनों को साकार भी कर पाएंगे? इस सवाल पर ज्योतिष ज्ञान से मुझे फिर सावधान किया गया कि आर्थिक स्थिति अच्छी रहेगी बल्कि बहुत अच्छी भी लेकिन धन का लेन-देन संतुलित तरीके से करना होगा। इस संतुलन को बिगाड़ने की सलाह देने वाले बहुत मिलेंगे। न ज़्यादा बात करना, न ही सुनना और न ही मानना। मन की बात सभी के साथ करने से बचना होगा। जितना कम बोलोगे उतना ही अच्छे रहोगे। 

फिर सोचा कि पारिवारिक और निजी जीवन पर भी कुछ जान लिया जाए। जवाब मिला वैवाहिक जीवन में उतार-चढ़ाव आ सकते हैं, लेकिन धैर्य से रिश्ते में मजबूती आ सकती है। इस तरह का जवाब सुन कर भी हंसी आई क्यूंकि पत्नी का देहांत हुए कई बार्स हो चुके हैं। उसके बाद कौन सा परिवार और कौन सा वैवाहिक जीवन!

हां स्वास्थ्य में गड़बड़ियां चल रही थीं। हाई बीपी, शूगर और इससे सबंधित बहुत कुछ और भी। इस लिए इस पर पूछा तो ज्योतिष ज्ञाता मित्र ने साफ़ और सख्त शब्दों में कहा कि स्वास्थ्य पर ध्यान देना अनिवार्य है, विशेष रूप से पैरों और नसों (वायु तत्व असंतुलन) से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। केतु परेशान भी कर सकता है और ब्भक्ति व् सन्यास का मार्ग भी दिखा सकता है। इसी चर्चा के दौरान एक रहस्य पता चला कि बिगड़े हुए इंसान को कई बार केतु महाराज इतनी चिंता में डालते हैं कि बिगड़ा इंसान तंग हो कर सीधे रास्ते पर आने लगता है। उसके सब बल निकल जाते हैं। उस बिगड़े हुए इंसान को सीधे मार्ग पर चला कर सही राह पर ले आते हैं केतु महाराज। इतना सीधा करते हैं कि बिगड़े हुए इंसान को स्वयं ही उचित लगने लगता है। वह सिगरेट, शराब और अन्य बुराइयां छोड़ कर अच्छाईयां अपनाने लगता है।  

साढ़ेसाती के इस दुसरे और चुनौतीपूर्ण चरण का सामना करने के लिए दान दक्षिणा की जानेवाली चीज़ें भी  बताई गई लेकिन एक सलाह बहुत ज़बरदस्त रही कि कभी भी जीवनशैली में कमज़ोरी मत दिखाना। मेहनत से पीछे न हटना और तनाव लेने से कभी भी बचने की कोशिश करना। हर चुनौती को स्वीकार करना लेकिन कूटनीति का साथ मत छोड़ना। 

इसी मकसद के लिए अर्थात साढ़ेसाती और अन्य मुश्किलों का सामना करने के लिए मेडिटेशन और पूजा पाठ करना भी बहुत अच्छा बताया गया। सलाह यह दी गई कि भगवान शिव या विष्णु जी की आराधना करें तो यह अधिक शुभ रहेगी। भगवान शिव से तो बचपन से ही एक विशेष स्नेह रहा है। वह ज़िंदगी में बहुत सी मुश्किलों का सामना करने की शक्ति भी देते रहे हैं और इसका आभास  होता रहा। इसी बहाने भगवन शिव का समरण अधिक किया जा सकेगा। 

ज्योतिष  विज्ञान  पर कुछ मित्रों से हुई चर्चा में एक और महत्वपूर्ण तथ्य बताया गया कि जिस शनि से सभी लोग डरते हैं वह बहुत न्यायप्रिय है। इस बार्स अर्थात 2026 में शनि का मीन राशि में ही बने रहना, उन लोगों के लिए बहुत ख़ास भी बनेगा जो रचनात्मक या आध्यात्मिक क्षेत्रों में हैं। उनके लिए आत्म-विकास का अवसर भी लेकर आएगा। ऐसे अवसर जो बिलकुल नई दुनिया सामने लाएंगे। ऐसी दुनिया जिसकी चमक डंक देख कर आप ही नहीं सभी हैरान रह जाएंगे। 

बहुत सी बातें और बहुत से तथ्य ऐसे रहे जिन पर इस पोस्ट में चर्चा नहीं की जा स्की। कोशिश रहेगी उन पर एक अलह विस्तृत चर्चा अलगे पोस्ट में की जा सके।  -मीडिया लिंक आर के तारेश 

Tuesday, December 30, 2025

इस बार पुस्तक मेलों पर एक नज़र

 Medialink32 on Tuesday 30th December 2025 at 18:10 Regarding Book Festivals Jalandhar

पुस्तक मेला जालंधर में आ रहा है और दिल्ली में भी//आपका कहां जाने का मन है इस बार?


चंडीगढ़//जालंधर//लुधियाना:30 दिसंबर 2025: (रेक्टर कथूरिया//साहित्य स्क्रीन डेस्क):: 

पुस्तक प्रेम के बहुत से सच्चे किस्से आपने भी सुने देखे होंगें। मैनें भी इनका अनुभव बहुत बार किया है। लोगों से बहुत सी बातें सुनीं। बहुत से कटाक्ष झेले लेकिन पुस्तक प्रेम कभी कम  यहीं हुआ। 
कई बार जेब में पैसे नहीं होते थे तो भी स्टाल का चक्क्र लगा लेना। जेब से जितने पैसे निकल सकते निकाल लेने जो कम पढ़ते उनका उधार कर लेना।  उन पुस्तक विक्रेताओं में से कई मित्रों के नाम आज भी याद हैं। कई इस दुनिया से विदा भी हो गए। 

कईओं ने कारोबार बदल लिया। आखिर बदलती अर्थव्यवस्था में बहुत बार बहुत से कदम मजबूरी में उठाने पड़ते हैं। उन्होंने भी मजबूरी में ही कारोबार बदले। जब धीरे धीरे अख़बार रस्लों की बिक्री भी कम होने लगी तो शायद कोई दूसरा चारा ही नहीं था। जो बस स्टैंड, घंटाघर, किसी प्रमुख चौंक या रेलवे स्टेशन पर होते थे।उनमें से भी कइयों ने कैंटीन खोल ली और किसी ने कुछ और सामान डाल लिया। हिन्द पाकिस्त बुक्स तक ने भी सस्ते वाले पेपरबैक्स एडीशन बहुत पहले ही प्रकशित कटने बंद कर दिए थे। मैंने खुद उस पुस्तक आंदोलन के दौरान दो या तीन रुपए  प्रति पुस्तक के हिसाब से बहुत सी अच्छी पुस्तकें पढ़ीं थी। इस बार जालंधर में पुस्तक मेला 9 से 11 तक लग रहा है। निश्चय ही आपको इस पुस्तके मेले में जाक बहुत सी मनपसंद पुःतकें मिलेंगी ही। 

लुप्त होते हुए इस विशाल पुस्तक बाजार को एक तो सहारा दिया था हिन्द पैकेट बुक्स की घरेलू लायब्रेरी योजना ने। हर महीने आपकी चुनी हुई पसंद की किताबें डाकिया घर पर ले आता था। पेमेंट वीपीपी सु हुआ करती थी। जिस दिन किताबें आनी होती उनकी इंतज़ार कई दिन पहले ही शुरू हो जाती।  हर महीने की वो रकम कोई ज़्यादा नहीं होती थे लेकिन जब मंदी चल रही हो तो कम पैसे भी बहुत लगते हैं। इस लिए चवन्नी अठन्नी एक रुपया भी बचा कर रखने कि कहीं डाकिए को देते समय पैसे कम न पड़ जाएं। ज़िंदगी में बुरे लोग भी मिलते रहे लेकिन अच्छे लोग भी बहुत मिले। वह डाकिया भी अच्छा ही था. पैसे कम पड़ने या उस समय न होने तो उस डाकिये ने कहना मैं दे देता हूँ आप बाद में मुझे दे देना। इस तरह लायब्रेरी ने अंतर्मन के पुस्तक प्रेम को और बढ़ाया साथ ही पुस्तकों को सहेजना भी सिखाया। पुस्तकों की सौगात का कल्चर भी अच्छा लगने लगा। 

स्कूल और अन्य संस्थानों की लायब्रेरी भी मन पसंद जगह बन गई। शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहाँ मेरा आनाजाना रहा हो लेकिन मुझे उसकी लायब्रेरी न पता हो। कई गांवों में तो बहुत अभियान चला कर लायब्रेरी खुलवाई। 

पुस्तक लायब्रेरी के बाद पुस्तक संस्कृति और कारोबार को एक नया उत्साह दिया पुस्तक मेलों ने। एक तो पुस्तकों की विविधता और विभिन्निता दूसरा के ही जगह ओर है क्षेत्र की पुस्तकें।  ऊपर से सस्ती भी पड़ती क्यूंकि डिकाऊँट मिल जाता था। [प्रकाशक निशुल्क भी बहुत कुछ देते जैसे की पत्र पत्रिकाएं और अन्य छोटी मोटी पुस्तिकाएं भी वहां से मिला जाती। लेखकों से भेंट का सुअवसर अलग रहता। उनसे बातें करने का आनंद ही अलग रहता।  हालाँकि अब सेहत की समस्या होने लगी हैं फिर भी पुस्तकों का लोभ हमेशां बना रहता है। पुस्तक मेलों की इंतज़ार भी बनी रहती है।  अब सबसे नज़दीक गौ जालंधर में लगने वाला पुस्तक मेला। 

वैसे निकट भविष्य में आपके क्षेत्र में भी प्रमुख पुस्तक मेले आयोजित होने वाले हैं।  एक जालंधर में और दूसरा नई दिल्ली में। दिलचस्प बात है की दोनों में अलग तरह का आकर्षण रहेगा। 

यहां संक्षिप्त विवरण भी दिया जा रहा है। वास्तव में पंजाब का जालंधर दशकों से ही प्रकाशन केंद्र रहा है। एजुकेशन से सबंधित पुस्तकों का भी और समाचार पत्रों का भी। माई हीरां गेट बाजार वाले इलाके में ज़्यादातर लोग पुस्तकें खरीदने ही आते थे। जानेमाने लेखक दीपक जालंधरी का कार्यालय हम सभी के लिए बहुत प्रमुख संस्थान रहता। सारा दिन चायपानी जल पान चलता रहता। मंडी रॉ यूं तो फिल्म वितरकों का केंद्र था लेकिन यहां रचना प्रिंटर्स वाले हरीश वि भी बहुत आकर्षक शख्सियत थे।  

खौर बात तो चल रही थी पुस्तक मेले की। इस बार भी बुकमाफिया का ड्रीम बुक फेयर-जालंधर में आकर्षण का केंद्र रहेगा ही। तारीखें हैं 9 जनवरी से 11 जनवरी 2026 अर्थात नए बार्स के आरंभिक दिन। स्थान: किंग्स होटल, ग्रैंड ट्रंक रोड, न्यू मार्केट, जवाहर नगर, जालंधर। मुख्य आकर्षण: इस मेले में 5 लाख से अधिक किताबें होंगी और आप किताबों को वजन के हिसाब से खरीद सकते हैं ("Buy Books by Weight")। प्रवेश निःशुल्क है। 

कुल मिलाकर वज़न के हिसाब से पुस्त्कें खरीदने वालों को भी सस्ती पड़ जाती हैं। आप चाहो तो इस बार आज़मा कर देख लो। मैंने यह सिलसिला चंडीगढ़ में देखा तो मुझे बहुत ही अच्छा लगा। आप भी आइए इस बार मिलते हैं जालंधर में। 

Thursday, December 4, 2025

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन..... !

3rd December 2025 at 10:49 मुझे याद है ज़रा ज़रा नई ब्लॉग पोस्ट  

जालंधर से भी बहुत सी यादें जुडी हुई हैं 

खरड़//मोहाली:3 दिसंबर 2025: (रेक्टर कथूरिया//मुझे याद है ज़रा ज़रा डेस्क)::


सत्तर का दशक भी खत्म हो चुका था।
बांग्लादेश की जंग भी समाप्त हो चुकी थी लेकिन खबरों और सियासत में इस जंग की परछाईआं अक्सर महसूस हो ही जाती थी। बंग बंधू शेख़ मुजीबुर रहमान की छवि भी देश भर में छायी  हुई थी। नवयुवा और दुसरे कलाकार भी शेख़ मुजीबुर रहमान के पेंसिल स्कैच बनाते आम नज़र आ जाते थे। बंगलादेश की स्वतंत्रता के साथ देश की भावनाएं जुडी हुई थी। अख़बारों में अक्सर यही खरें सुर्खियां बनी होतीं। बंगलादेश की स्टोरियां बहुत उभार कर प्रकाशित की जा रही थीं। 

पंजाब के राजनैतिक हालात भी कुछ बदल चुके थे। सियासत से जुड़े वाम के मित्रों और शुभचिंतकों ने भी पिता जी को सलाह दी थी कि अब भूमिगत वाले जीवन के अज्ञातवास से बाहर आ कर खुले माहौल वाली लोकतान्त्रिक धारा में काम करें। सत्ता की तरफ से आ रहे ब्यान भी बहुत लुभावने थे। फिर भी सोचने वाली बात थी की इन लुभावने बयानों में कितना सच होता है। इन पर यकीन करना सही भी है या नहीं?

मानसिकता और हालात दोनों ही दुविधापूर्ण थे। यह फैसला आसान भी नहीं था कि पंजाब लौटना उचित होगा या नहीं?  इसका फैसला यथा सहज भी नहीं था। इसी सोच विचार में एक डेड बरस और गुज़र गया। सरकार की सख्त नीतियों के चलते 28 जुलाई 1970 को बाबा बूझा सिंह को ग्रिफ्तार करके एक झूठे पुलिस मुकाबिले में उनकी हत्या की जा चुकी थी। नक्सलवादियों के लिए माहौल लगातार गंभीर बना हुआ था। मार्च 1972 में पंजाब के मुख्य मंत्री बन कर अप्रैल 1977 तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले ज्ञानी ज़ैल सिंह बहुत तेज़ी से लोकप्रिय हुए। 

मैंने अपने जन्मस्थल वाले बचपन के उस  घर के इलाके नवां मोहल्ला की एक नुक्क्ड़ में सटे प्रसिद्ध मोचपुरा बाजार और उसके जानेमाने सुभानी बिल्डिंग चौंक वाले इलाके में मुख्यमंत्री ज्ञानी ज़ैल सिंह को एक खुली जीप में देखा। वे आम जनता के इतने नज़दीक थे कि बच्चे भी उन्हें छू पा रहे थे। उन्होंने की बच्चों की तरफ गुलाब के फूल भी उछाले ,उन्होंने खुद भी अपनी लंबी अचकन जैसी पौशाक पर गुलाब का बड़ा सा फूल टांगा हुआ था। उन्हें देख कर चाचा जवाहर लाल नेहरू की छवि याद आ रही थी। ज्ञानी जी से मिलने की बहुत इच्छा हुई लेकिन मेरी उम्र भी बहुत कम थी और मेरी वहां सुनता भी कौन। फिर भी यह इच्छा पूरी हुई कुछ बाद में अमृतसर जा कर। इस सारी  कहानी की चर्चा भी लिसी अलग पोस्ट में सही। 

पंजाब लौट कर साहित्य की लग्न और बढ़ गई। उन दिनों पंजाब का अखबारी केंद्र जालंधर ही था। चंडीगढ़ से अंग्रेज़ी ट्रिब्यून ही प्रमुख समाचार पत्र निकलता था। ट्रिब्यून के बाद इंडियन एक्स्प्रेस और जनसत्ता भी चंडीगढ़ से निकलने लगे। जालंधर से हिंदी मिलाप, मिलाप, वीर प्रताप और प्रताप, पंजाब केसरी, हिन्द समाचार, पंजाबी में कौमी दर्द, अकाली पत्रिका, अजीत, जत्थेदार अखबार प्रमुख हुआ करते थे। इन में सबसे महत्वपूर्ण गिना जाता था वाम समर्थक पंजाबी समाचार पत्र नवां ज़माना। यही वाम पत्र था जिसने बहुत से नए लोगों को पत्रकारिता के गुर सिखाए।

इसी मीडिया ससंथान में रहते हुए बहुत से महान लोगों से मुलाकात भी होती रही। इन महान लोगों से हुई मुलाकातों और बातों की चर्चा भी होती रहेगी। फिलहाल यहां विराम चाहता हूँ। 

Sunday, November 2, 2025

काश वे सब होते तो बन ही जाती चाइना गेट की पंजाब टीम भी

Saturday:01st November 2025 at 02:15 AM मुझे याद है ज़रा ज़रा...!

एक दिन डाक्टर भारत भी चल बसे और जल्द ही ओंकार पुरी भी


लुधियाना: 1 नवंबर 2025: (रेक्टर कथूरिया/ /मुझे याद है ज़रा ज़रा . ..!)::

ओंकार पुरी साहिब 2012 से लेकर इसके बाद वाले कुछ बरसों तक हम साथ ही रहे। तकरीबन हर रोज़ मुलाकात होती। वास्तव में  मेरी जान पहचान ही इन लोगों से 2012 में हुई  जब हम लोग सुब्हानी बिल्डिंग और मोचपुरा बाजार वाला संकरा  इलाका छोड़ कर सिविल लाइंस वाले कुछ खुले इलाके में आ गए। यहां ओंकार पूरी डा. भारत के अनन्य मित्र थे और मेरा भी डा. भारत से दिल और रूह का रिश्ता था। उनका अध्यात्म की दुनिया में काफी ज्ञान था। जाम और अध्यात्म की खुमारी वाले लोग बहुत कम मिलते हैं। डा. भारत उन्हीं में से थे। काश वे सब होते तो बन ही जाती चाईना गेट जैसी पंजाब की टीम भी। 

यहां सिविल लाईन्ज़ में आ कर हमारे घर के नज़दीक ही था डाक्टर भारत का दफ्तर। इस दफ्तर में मीडिया भी चलता था और डिटेक्टिव एजेंसी जैसा काम भी। पुरी साहिब उनके काम में बहुत निकट वाले दोस्त थे। शायद इनका पद भी प्रसधन या महासचिव जैसा रहता था। इस लिए तकरीबन हर रोज नहीं तो दूसरे तीसरे दिन मुलाकात हो ही जाती। उनका यह साथ उनकी आखिरी सांस तक बना भी रहा। व्यवसाय से वह अकाउंटेंट थे। एकाउंट्स की बारीकियों को समझने वाले थे। नई आर्थिक नीतियों और टेक्स इत्यादि की उलझनों की भी उन्हें पूरी समझ थी। 

उनके ग्राहकों में बहुत बड़े लोग भी थे जिनके आर्थिक फायदे की बात का ध्यान रखना उन्हें आता था। उनके कुछ ग्राहक तरनतारन के पट्टी इलाके में थे। यह शायद उनका पुश्तैनी इलाका ही था। वह हफ्ते दो तीन या कभी कभी चार दिन पट्टी जाया करते। उनकी ज़िद भी थी कि जाते थे अपनी स्कूटरी पर। चलाते भी बहुत तेज़ रफ़्तार में। जब वह बस पर सफर की बात नहीं माने तो हमने उन्हें मनाया कि आप काम वाले तीन चार दिन पट्टी में ही रहा करो। हर रोज स्कूटरी का इतना लंबा सफर मत किया करो। पट्टी से लुधियाना तक। अच्छा भला इंसान बस या कार में भी इतने लंबे सफर में थक जाता है। 

खैर उन्होंने हर रोज़ स्कूटर के सफर की ज़िद छोड़ ही दी। वास्तव में बस पर चढ़ने के लिए बनी ऊंची सीढ़ियां उनके घुटनों में दर्द छेड़ देती थी। इसके लिए वह डाक्टर भारत की सलाह से एक बड़ी सी बोतल वाली आयुर्वेदिक दवाई भी पिया करते थे। कैप्सूल भी इस दवा में शामिल रहते। दोनों दवाएं महंगी हुआ करती पर उनकी जेब इतना खर्चा आसानी से उठा लेती थीं। 

जब भी मिलते तो शाम का अरेंजमेंट कर के रखते थे। बस सूरज ढलते ही वह स्कूटर की डिक्की से सामान निकाल लाते। दोमोरिया पुल वाली मार्किट में प्रीतम का ढाबा बहुत पुराना था। शायद अब भी होगा लेकिन पिछले कुछ बरसों से उधर आनाजाना भी नहीं हुआ। प्रीतम की ज़िंदगी में प्रीतम से भी बहुत प्यार रहा क्यूंकि उसके पड़ोस में ही एक अखबार भी निकला करता था। अजीब इत्तिफ़ाक़ की जब अखबार के मालिक ने उस दूकान को बेचा तो वहां शराब का बहुत बड़ा ठेका खुल गया। हम हंसा करते देख ले प्रीतम तेरे और तेरे ढाबे के असली साथी बहुत नज़दीक आ गए। 

समय का चक्र चलता रहा। प्रीतम का देहांत हो गया। फिर ढाबा उसके बेटे ने संभाल लिया। प्रीतम के बेटे ने भी अपने पिता की तरह आपसी प्रेम प्यार को बनाए रखा। किसी दिन नहीं जा पाते और आँख बचा कर निकलने लगते तो झट से आ कर रास्ता रोक लेता। हम बताते आज राशनपानी का खर्चा जेब में नहीं है। 

इस पर नाराज़ हो कर बोलता। .मैं हूँ न अभी। बस चलो। ढाबे से लड़को को आवाज़ देता कि चल इनके स्कूटरों को साइड पर लगा और हमें खुद बाज़ू से पकड़ता और बहुत प्रेम से ढाबे में ले जाता। ढाबे में ले जाकर पांच सौ के दो   नोट डाक्टर भारत साहिब के सामने रखता और कहता जिस ब्रांड की भी मंगवानी है मंगवा लो। जो खाना है उसका आर्डर दे दो मैं अभी भिजवाता हूँ। खुद बाहर काउंटर पर जा कर बैठ जाता। इसके बाद एक दो बार चक्र भी लगा जाता लेकिन उसने खुद कभी हमारे साथ दारू नहीं पिया। हमने कई बार गिला  भी किया तो कहने लगा आप लोग वोडका पीते हो और मेरा ब्रांड और है। किसी दिन बैठेंगे ज़रूर। लेकिन वह दिन कभी न आया। बस हम बैठते और शाम ज़्यादा ढलने लगता निकलपड़ते। पुरी साहिब ने लुधियाना में भी शिमलापुरी जाना होता था। बस कुछ देर हवा प्याज़ी हो कर हम वापिसी की तयारी करते। बस उन दिनों यही थी हमारी दुनिया। अब जिसकी यादें शेष हैं। 

हम लोगों के जिन गिने चुने कुछ मित्रों की एक छोटी सी दुनिया थी उस में में पुरी साहिब काफी सरगर्म रहे। उनकी याद आई तो सोचा किस के साथ बात करें। आखिर एक धड़ल्लेदार संगठन बेलन ब्रिगेड की संस्थापिका अनीता शर्मा जी और उनके पति श्रीपाल जी का ध्यान आया। उनसे बात की तो उन्होंने ने भी बहुत नम आंखों से उन्हें याद किया। डाक्टर भारत और अनीता शर्मा जी की टीम के साथ डाक्टर भारत और पुरी साहिब भी काफी सक्रिय रहते रहे। हर बरस 26 जनवरी और 15 अगस्त को जब डाक्टर भारत कार्क्रम का आयोजन करते तो सरगर्मी शुरू होते ही अनीता शर्मा सुबह सुबह लडडू के पचार डिब्बे ले कर पहुँच जाते। कुछ और लोग भी थे जो अपना अपना योगदान बहुत श्रद्धा से डालते। कई नाम हैं जिनकी चर्चा फर्क कभी करेंगे। 

एक बार एक जज मैडम ने वहां पहुँच कर तिरंगा लहराया। कई बार कोई न कोई एम एल ए या सासंद इस ध्वज को लहराता। कुछ न कुछ वीआईपी ज़रूर पहुँचते। डाक्टर भारत पुरी साहिब और हम सभी ने मिल कर अपने इस संगठन को नाम दिया हुआ था चाईना गेट। बिलकुल इसी नाम पर बानी फिल्म वाली टीम की तरह इरादे थे। बस एक दिन दिल दिमाग पर कुछ बोझ पड़ा  और डाक्टर भारत चल पड़े। चाईना गेट टीम का अस्तित्व डाक्टर भारत के बाद ही खतरे में आ गया था। उनसे कहा भी कि इसको बचाने के लिए कुछ कर सकते हो तो जल्दी कर लो वरना कुछ भी सम्भाला न जाएगा।काश डाक्टर भारत ने यह सभी इंतज़ाम अपने होते होते कर लिए होते। उनसे बहुत बार कहा भी थी मान भी जाते रहे लेकिन वक़्त और हालात उन्हें फिर किसी नई उलझन में उलझा देते थे।

आखिर वही हुआ जिसका खतरा था। काश डाक्टर भारत सब अपनी आंखों से देख पाते। उनके जाने के बाद उस नाज़ुक घड़ी में चाईना गेट टीम के सभी दो चार सदस्यों का जो नैतिक कर्तव्य भी था इसे बचाने का वह भी मंद पड़ता गया। अंग्रेजी में शायद इसे  Moral Duty भी कहा जाता है। अर्थात नैतिक कर्तव्य। मैंने सभी से कहा भी कि किसी तरह इन स्मृतियों को संभाल लिया जाए वरना वक़्त के साथ साथ हमारी ज़मीर और भगवान भी हम लोगों को कभी माफ नहीं करेंगे। कई मित्रों से कहा लेकिन सब व्यर्थ गया। डाक्टर भारत के बाद न इस संगठन को बचाया जा सका और न ही इस विचार को। 

डाक्टर भारत के बाद ओंकार पुरी भी चल बसे। कोरोना डाक्टर भारत के रहते ही गंभीर हो गया था। फिर स्थिति और बिगड़ती चली गई। उदास मन से हमने भी लुधियाना छोड़ दिया। अब भी जब कभी लुधियाना जाना होता है तो उस इलाके में जाने का मन ही नहीं होता। उदासी लगातार गहराई हुई है। बस एक बार फिर से मानना पड़ता है कि जाने वाले कभी नहीं आते - --जाने वालों की याद आती है। 

इन यादों में से जब जब भी किसी याद ने ज़ोर पकड़ा और कुछ लिखा भी गया तो ज़रुर दोबारा हाज़र हो जाऊंगा कोई न कोई नई रचना ले कर।  तब तक के लिये आज्ञा चाहता हूं। 

Sunday, October 12, 2025

राकेश वेदा जी से पहली भेंट

Received From Mind and Memories on Thursday 9 October 2025 at 02:30 AM and Posted on 12th October 2025 

बहुत दिलचस्प हैं इप्टा वाले राकेश वेदा 

जालंधर नवांशहर मार्ग पर स्थित है खटकड़कलां। पर्यावरण भी बहुत ही मनमोहक और इतहास भी सभी को अपना बना लेने वाला। मुख्यमार्ग पर ही स्थित है शहीद भगत सिंह जी की यादें ताज़ा करने वाला शानदार स्मारक। 

कुछ बरस पहले की बात है। जगह थी खटकड़ कलां।"ढाई आखर प्रेम के"-यह था काफिले का नाम। इस ऐतिहासिक स्थान से शुरू हो कर इस काफिले ने पूरे पंजाब के गांव गांव में जाना था। बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता और तेज़ होती जा रही नफरत की सियासत के खिलाफ कुछ प्रगतिशील लोग इप्टा के बैनर तले खुल कर सामने आए हुए थे। "ढाई आखर प्रेम के......."  इस संदेश को गांव गांव के घर घर तक पहुँचाया जा रहा था। शहीद भगत सिंह के पैतृक गाँव से इसकी शुरुआत सचमुच बहुत असरदायिक थे। आसपास के गाँवों से भी बहुत से लोग वहां पहुंचने लगे थे। पंजाब की तरफ से मेहमाननवाज़ी करने वालों में देविंदर दमन भी थे, संजीवन सिंह भी, इंद्रजीत रूपोवाली भी और बलकार सिंह सिद्धू भी पूरे जोशो खरोश के साथ मौजूद थे।  

राकेश वेदा जी से पहली भेंट हुई थी खटकड़ कलां वाले मुख्य हाइवे पर जहां शहीद भगत सिंह जी की स्मृति में बहुत बड़ा सरकारी स्मारक बना हुआ है। इसी इमारत के पीछे है शहीद भगत सिंह जी का पुश्तैनी घर। वहां अब भी बहुत सी स्मृतियाँ शेष हैं। बाहर वाली सरकारी इमारत के गेट से बाहर निकल कर एक सड़क इसी पार्क के साथ साथ चलती हुई शहीद के पुश्तैनी घर तक ले जाती है। 

इससे पहले कि काफिला चल कर शहीद के पुश्तैनी घर तक जाए हम लोग इस रुट और अन्य प्रोग्राम को डिसकस कर रहे थे। मैं वहां कवरेज के लिए गया था। कैमरे के साथ साथ एक नोटबुक भी मेरे पास थी। जो जो लोग बाहर से आए थे उनके नाम स्टेशन और फोन नंबर उसी में नोट किए जा रहे थे। चूंकि मेरे कानों में काफी समय से समस्या चल रही है इसलिए मुझे डर रहता है कि कहीं नंबर या नाम गलत न सुना जाए। मैं जिसका नाम या नंबर नोटों करना चाहूँ उसके सामने अपनी नोट बुक कर देता हूं।  


मुझे याद है इप्टा के इस सक्रिय लीडर का कद लम्बा था और और नज़र हर तरफ ध्यान रख रही थी। सभी सदस्यों को साथ साथ बड़ी मधुरता से दिशा निर्देश भी दिए जा रहे था। जब मैंने उन्हें अपना मीडिया कवरेज का परिचय दिया तो साथ ही अपनी नोट बुक भी उनके सामने कर दी। उन्होंने अपना नाम लिखा राकेश वेद और साथ ही नंबर भी। 

नाम के साथ वेदा शब्द पढ़ कर मुझे दिलचस्पी और बढ़ गई और मैंने पूछा आप ने भी द्विवेद्वी ,  त्रिवेदी और चतुर्वेदी के नरः वेद पड़े हुए हैं क्या? बात सुन कर मुस्कराए और कहने लगे ऐसा कुछ नहीं है। वास्तव में मेरी पत्नी का नाम वेदा है। मैं अपने नाम के उनका नाम जोड़ लेता हूँ और वह अपने नाम के साथ मेरा जोड़ कर वेदा राकेश लिखती हैं।  

उस दिन हम सभी लोग शहीद भगत सिंह जी के पैतृक घर पर भी गए। इसके बाद छोटी बड़ी गलियों में से होते हुए पास ही स्थित एक गांव में बने गुरुद्वारा साहिब के हाल में भी। वहां नाटकों का मंचन भी हुआ। जनाब बलकार सिद्धू ने अपने भांगड़े वाली कला और बीबा कुलवंत ने अपनी आवाज़ की बुलंदी से अहसास दिलाया कि क्रान्ति आ कर रहेगी। शहीदों का खून रंग लाएगा। इसके बाद और दोपहर का भोजन भी यादगारी रहा। लंगर सचमुच बहुत स्वादिष्ट था। 

रात्रि विश्राम बलाचौर/ /नवांशहर की किसी महल जैसी कोठी में था। इप्टा के चाहने वाले बहुत ज़ोर दे कर हमें वहां ले गए थे। रात्रि भोजन के बाद कुछ मीठा सेवन करते समय किसी ने कहा कि अब हालात बहुत कठिन बनते जा रहे हैं। सत्ता और सियासत शायद खतरनाक रुख अख्त्यार कर सकती है।  यह सब सुन कर राकेश जी ने उर्दू शायरी में से ग़ालिब साहिब की शायरी भी सुनाई और दुष्यंत कुमार जी के शेयर भी। इस शायरी से सभी में नई जान आ गई। 

अब कोशिश है जल्द ही उनसे मिलने लखनऊ जाया जा सके। वैसे तो भेंट का इत्तिफ़ाक़ कहीं अचानक बी हो सकता है किसी अन्य जगह पर भी।  --रेक्टर कथूरिया 

Saturday, March 1, 2025

शायद जन्मों जन्मान्तरों तक भी विसर्जित नहीं हो पाती यादें...!

पहली मार्च 2025//याद न जाए बीते- दिनों की....!

बहुत सी बातों के सबूत नहीं होते लेकिन उन पर कमाल का यकीन उम्र भर बना रहता है---!

विसर्जन नहीं हो पाता शायद इसी लिए करनी पड़ती है मुक्ति के लिए साधना


कर्मकांड होता तो शायद विसर्जन भी हो जाता--!

न भी होता तो कम से कम तसल्ली तो हो जाती--!

लेकिन सचमुच विसर्जन हो ही कहां पाता है....!

शायद जन्मों जन्मान्तरों तक भी विसर्जित नहीं हो पाती यादें...!

इसकी याद दिलाई नूतन पटेरिया जी ने। उनकी हर पोस्ट कुछ नए अनुभव जैसा दे जाती है।

कुछ स्थान--कुछ लोग--कुछ रेलवे स्टेशन--कुछ ट्रेनें-कुछ रास्ते--कुछ यात्राएं---शायद इसी लिए याद आते हैं..!

उनसे कोई पुकार भी आती हुई महसूस होती है---!

कुछ खास लोगों की कई अनकही बातें भी शायद इसीलिए सुनाई देती रहती हैं---क्यूंकि किसी न किसी बहाने उनसे मन का कोई राबता जुड़ा रहता है..!

बहुत सी बातों के सबूत नहीं होते लेकिन उन पर कमाल का यकीन उम्र भर बना रहता है---!

मुझे लगता है इस सब पर विज्ञान निरंतर खोज कर रहा है---!

एक गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था--

तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई--- यूं ही नहीं दिल लुभाता कोई..!

ऐसी भावना और ऐसे अहसास शायद उन्हीं यादों के चलते होते हैं जो कभी विसर्जित नहीं हो पाती---!

यह बनी रहती हैं..कभी बहुत तेज़--कभी बहुत धुंधली सी भी..!

यह कभी भी विसर्नजित नहीं हो पाती...न तो उम्र निकल जाने पर--न देहांत हो जाने पर और न ही शरीर बदल जाने पर-----!

शायद यही कारण होगा कि धर्मकर्म और मजहबों में स्मरण अर्थात याद पर ज़ोर दिया जाता है....!

जाप एक खूबसूरत बहाना है इस मकसद के लिए..!

एकागर होने पर ही बुद्धि ढूँढ पाती है--- दिमाग या मन के किसी न किसी कोने में छुपी उन यादों को जो विसर्जित नहीं हो पाती---!

कभी विसर्जित न हो सकी इन यादों का यह सिलसिला लगातार चलता है...संबंध बदलते हैं..जन्म बदलते हैं..जन्मस्थान भी कई बार बदलते हैं...लेकिन अंतर्मन में एक खजाना चूप रहता है...!

नागमणि की तरह रास्तों को प्रकाशित भी करता रहता है...और शक्ति भी देता रहता है...!

कुंडलिनी की तरफ सोई यादें जब कभी अचानक जाग जाएँ तो उसमें खतरे भी होते हैं...!

अचानक ऐसी बातें करने वालों को मानसिक रोगी कह कर मामला रफादफा कर दिया जाता है लेकिन उनकी बातें निरथर्क नहीं होती...!

कुंभ जैसे तीर्थों में जा कर जब शीत काल की शिखर होती है तो ठंडे पानी में लगे गई डुबकी बहुत कुछ जगाने  लगती है...!  श्रद्धा और आस्था से इसे सहायता मिलती है...!

यदि ऐसे में किसी का तन मन हल्का हो जाता है तो समझो बहुत सी यादें विसर्जित हो गई...!

बहुत से पाप धुल गए--...!

बहुत सी शक्ति मिल गई...!

अधूरी इच्छाएं और लालसाएं..उसी धरमें बह गई---

इसे ही कहा जा सकता है मुक्ति मिल गई...!~

---रेक्टर कथूरिया 

Thursday, October 10, 2024

अब भी याद है दिल्ली वाली डीटीसी बसों का जादू

एक और सवा रूपए में बन जाया करता था दैनिक बस पास 


चंडीगढ़//मोहाली: 10 अक्टूबर 2024: (रेक्टर कथूरिया//मुझे याद है ज़रा ज़रा डेस्क)::

सन 1969 में साहिब श्री गुरु नानक देव जी के 500 वर्षीय प्रकाश उत्सव के समारोह चल रहे थे। जगह जगह उत्सव, श्रद्धा और आस्था का माहौल था। उन्हीं दिनों उत्तर भारत को एक महान यूनिवर्सिटी भी मिली। अमृतसर शहर में स्थित गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी की अपनी अलग पहचान और एतिहासिक महत्व सभी जानते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस विश्वविद्यालय को सिखों के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जी के 500वें प्रकाशोत्सव के मौके स्थापित करने का एलान किया गया था। उसी वर्ष इसका नींव पत्थर रखा गया था। इसी वजह से ही इसका नाम गुरु साहिब के नाम पर रखा गया है। उनदिनों हालात के मद्देनज़र मैं अमृतसर में था। खालसा कालेज के गेट से गयर्ने एयर अंदर भी आना जाना होता रहता था। वहां से कहीं और जाने का मन भी नहीं था लेकिन इंसानी इच्छा कब पूरी होती है। अक्सर जो सोचो उसके विपरीत हालात बन जाते हैं। 

मेरे बारे में भी परिवार का फैसला कुछ अचानक ही हुआ कि मुझे अब दिल्ली जाना होगा। बार बार जगह बदली के कारणों पर किसी अलग पोस्ट में लिखा जाएगा। अमृतसर से दिल्ली शायद ट्रेन से यह मेरा पहला सफर था। दस या ग्यारह बरस की उम्र रही होगी उस समय मेरी। 

अमृतसर बहुत बड़ा और वंदनीय स्थल है लेकिन दिल्ली के बारे में कहा जाता था कि दिल्ली है दिल हिंदुस्तान का! यह तो तीर्थ है सारे जहान का? यह गीत उन दिनों रेडियो पर भी बहुत बजता था। दिल्ली की चर्चा सुनी थी या किताबों में पढ़ा था लेकिन दिल्ली को अपनी आंखों से पहली बार देखना था। 

ट्रेन के दिल्ली पहुंचते पहुंचते अंधेरा छाने लगा था। रेलवे स्टेशन पर पिता जी लेने आए हुए थे। रेलवे स्टेशन से सीधा घर पहुंचे। घर में मां थी जो बहुत देर बाद मिली थी। उसके ख़ुशी के वो आंसू  मुझे आज भी याद हैं। 

उसके बाद नींद भी महसूस होने लगी। नींद के बावजूद दिल्ली की अखबारों पर एक संक्षिप्त सी नज़र डाली। बुरे से बुरे हालात में भी हमारे घर अखबार आती रही थी। अख़बार का आना कभी बंद नहीं हुआ। हां! पंजाबी की कोई अखबार वहां नहीं थी लेकिन वहां के लोकप्रीज़ अख़बार नवभारत टाईम्स और दैनिक हिंदुस्तान बहुत अच्छे लगे। वे छपाई में रंग बिरंगे अखबार तो नहीं थे लेकिन एक रंग में भी बहुत खूबसूरत लगते थे जैसे किसी समझदार शख्सियत से बातें हो रही हों। 

पंजाब की अखबारों में अभी तक यह छवि महसूस नहीं हुई थी। इनमें नौजवानी जैसा जोश था। लड़कपन वाली छवि भी कह सकते हैं। व्यक्तिगत तौर पर एक दूसरे के खिलाफ लिखना जालंधर की अखबारों का रूटीन बन चुका था। पहले पहल प्रताप, मिलाप और हिंद समाचार में यह सिलसिला तेज़ हुआ था जिसमें कुछ समय बाद पंजाबी अखबार भी शामिल हो गए थे। उन दिनों जालंधर में अजीत, अकाली पत्रिका, कौमी दर्द और जत्थेदार अखबार भी शामिल हो गए थे। हां कामरेड विचारधारा को समर्पित अखबार नवां ज़माना अपनी अलग मस्ती में चला जाता था। इस अख़बार के छवि बहुत गंभीरता वाली थी। 

दिल्ली की अखबारों में पंजाब अखबारों जैसी कोई बात नज़र नहीं आती थी। दिल्ली की अखबारों में छपती सामग्री कुछ अधिक वरिष्ठ किस्म की हुआ करती थी। राष्ट्रिय और अंतर्राष्ट्रीय समझ विकसित हुआ करती थी। इसके साथ ही आर्थिक और समाजिक मुद्दों पर भी चर्चा रहती थी। 

इन अखबारों  के पढ़ते पढ़ते ही शुरू हुआ दिल्ली में घूमने का सिलसिला। यह सब डीटीसी की बसों में सफर करके ही संभव था। आटो रिक्शा या टैक्सी की तो कल्पना भी मुश्किल लगती थी। 

डीटीसी की बस में बैठ कर कभी कभी डबल देकर का मज़ा ही लेते थे। जब दिल्ली में कहीं निकलते तो तेज और इंकलाब जैसी अखबारें बस स्टैंडों पर बिकती नज़र आती खास कर संध्या अखबारें। यह अखबार पांच पैसे में मिल जाया करते थे। एक ही पृष्ठ दोनों तरफ छपा होता था। बाद में दो पृष्ठ भी होने लगे थे। फिर ज़्यादा भी। डबल देकर में बैठ कर उस अख़बार  तो लगता अपने मोबाईल चौबारे बैठे  पलट रहे हों। बस अख़बार पढ़ने के उस शाही अंदाज़ की फीलिंग लेते समय चाय वाली प्याली की कमी खटकती रहती। 

पहले एक रुपया और फिर जल्द ही सवा रुपए से पूरे दिन का पास बना करता था। पहले पहल केवल रविवार और फिर जल्द ही हर रोज़ बनने लगा था। उस समय सत्तर का दशक शुरू हो चुका था। इन बसों का सफर आम जनता के लिए लाइफ लाइन की तरह था। इन बसों से पूरी दिल्ली नहीं तो काफी दिल्ली रोज़ घूमी जाती थी। 

डीटीसी बसों में सफर के लिए एक रुपए वाला वह दैनिक पास बनवाने से एक्सप्रेस बसों में चढ़ने पर पांच पैसे की एक्स्ट्रा टिकट भी अलग से लेनी पड़ती थी जो कि झमेला ही था पर अगर सवा रुपए वाला पास टिकट बना लिया जाता तो यह झंझट नहीं रहता था। इस तरह पूरी दिल्ली बिना कोई दूसरी टिकट लिए घूमी जाती थी। दैनिक पास और मंथली पास का बहुत अच्छा सिस्टम मोहाली चंडीगढ़ में चलती सी टी यू (CTU) की बसों में भी है लेकिन यहां  खरड़ से छह फेस तक दस रूपये की टिकट  बावजूद लेनी  पड़ती है। आती बार भी और जाती बार भी। कुछ अन्य मार्गों पर भी दस या पंद्रह रूपये लगते हैं। 

यही फॉर्मूला बाद में रेलवे ने भी सुपर टिकट वाला MST अर्थात मंथली सीजनल टिकट जारी करते वक्त अपनाया था। उन दिनों अमृतसर दिल्ली के दरम्यान तीन या चार पास बना करते थे। कारोबारी लोग अमृतसर दिल्ली के दरम्यान हर रोज़ सफ़र किया करते थे। टिकेट के लिए लंबी लाइन से भी छुटकारा हुआ रहता था। ये लोग सुबह घर से नाश्ता करके तड़के तड़के दिल्ली के लिए निकलते। दोपहर का भोजन दिल्ली में करते कर रात का भोजन घर लौट कर किया करते। रस्ते वाली चाय उस समय ट्रेन में ही बहुत अच्छी मिलती थी। 

दिल्ली में बहुत शानदार बसें चलती हैं लेकिन फिर भी मन से डीटीसी बसों की याद नहीं जाती। उस समय डीटीसी ही थी दिल्ली वालों की सफर वाली लाइफ लाइन। अगर आपने भी इनमें सफर किया था तो आपको भी याद होगा डीटीसी बसों का जादू। 

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शनि की साढ़ेसाती कई रंगों में काफी कुछ दिखा सकती है

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